000 03055nam a22002297a 4500
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020 _a9789371971270
082 _a891.433 TRI
100 _aTripathi, Suryakant
245 _aBillesur bakriha aur kukurmutta = बिल्लेसुर बकरिहा, और कुकुरमुत्ता
260 _aChennai:
_bEkada,
_c2025.
300 _a95p.:
_bpbk.:
_c22 cm.
520 _aबिल्लेसुर बकरिहा भारत के महान कवि एवं रचनाकार सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का एक व्यंग उपन्यास है। निराला के शब्दों में ‘हास्य लिये एक स्केच’ कहा गया यह उपन्यास अपनी यथार्थवादी विषयवस्तु और प्रगतिशील जीवनदृष्टि के लिए बहुचर्चित है। बिल्लेसुर एक गरीब ब्राह्मण है, लेकिन ब्राह्मणों के रूढ़िवाद से पूरी तरह मुक्त। गरीबी के उबार के लिए वह शहर जाता है और लौटने पर बकरियाँ पाल लेता है। इसके लिए वह बिरादरी की रूष्टता और प्रायश्चित के लिए डाले जा रहे दबाव की परवाह नहीं करता। अपने दम पर शादी भी कर लेता है। वह जानता है कि जात-पाँत इस समाज में महज एक ढकोसला है जो आर्थिक वैषम्य के चलते चल रहा है। यही कारण है कि पैसेवाला होते ही बिल्लेसुर का जाति-बहिष्कार समाप्त हो जाता है। संक्षेप में यह उपन्यास आर्थिक सम्बन्धों में सामन्ती जड़वाद की धूर्तता, पराजय और बेबसी की कहानी है। वहीं, 'कुकुरमुत्ता' (1941) एक लंबी प्रतीकात्मक कविता है जो पूंजीवाद (गुलाब के माध्यम से) पर करारा प्रहार करती है।
650 _aNirala, Suryakant Tripathi, 1896–1961—Criticism and Interpretation
650 _aSatire—Hindi
650 _aRural Life—India—Fiction
650 _aCapitalism—Fiction
650 _aSocial Criticism—India
650 _aSocial Problems—India—Fiction
942 _cHIN
999 _c64325
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