000 03149nam a22002297a 4500
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020 _a9789371978408
082 _a891.433 PRA
100 _aPrasad, Jai Shankar
245 _aKankal = कंकाल
260 _aChennai:
_bEkada,
_c2025.
300 _a211p.:
_bpbk.:
_c20 cm.
520 _a‘हम लोग जैसे भी हों, पर संतानें तो हम लोगों की बुराइयों से अनभिज्ञ रहें। अन्यथा, उनके मन में बुराइयों के प्रति अवहेलना की धारणा बन जाती है और वे उन अपराधों को फिर अपराध नहीं समझते—जिन्हें वे जानते हैं कि हमारे बड़े लोगों ने भी किया है।’ 1929 में प्रकाशित ‘कंकाल’ प्रसाद जी का पहला उपन्यास है। इस उपन्यास में उन्होंने समाज के अनेक, विशेषकर धार्मिक और समाज सुधारक वर्गों के भीतर फैले छ्ल-छद्म का गहरा अन्वेषण, विवेचन प्रस्तुत किया है। सम्भवत; इसीलिए प्रसाद जी के इस उपन्यास की गणना हिन्दी के यथार्थवादी उपन्यासों में की जाती है। इस उपन्यास की विशेषता इसकी कथात्मक बुनावट भी है। ‘कंकाल’ की कथा अलग-अलग नगर में रह रहे विभिन्न पात्रों के मिलन और विछोह के ताने-बाने से बुनी गयी है। सामाजिक सामंजस्य की दृष्टि इस उपन्यास में अद्भुत है। इसमें वर्णित कथा से आभास मिलता है कि ‘समाज’ नाम की इकाई से स्त्री व पुरुष के बीच परस्पर दैहिक आकर्षण को न धर्म रोक सकता है न समाज-सेवा की भावना । ‘काम’ एक नैसर्गिक अवयव है, जिसे मनुष्य के जीवन से समाप्त नहीं किया जा सकता।
650 _aPrasad, Jaishankar, 1889–1937—Criticism and Interpretation
650 _aHindi Fiction
650 _aRealism in Literature—India
650 _aSocial Problems—India—Fiction
650 _aReligion and Society—India—Fiction
650 _aHuman Relationships—Fiction
942 _cHIN
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