000 03077 a2200229 4500
008 250927b |||||||| |||| 00| 0 eng d
020 _a9789388211680
082 _a658.8 PAN
100 _aPandey, Kailash Nath
245 _aVigyapan bazar aur hindi = विज्ञापन बाजार और हिन्दी
260 _aNew Delhi:
_bLokbharti Prakashan,
_c2019.
300 _a409p.:
_bill.; pbk.:
_c24 cm.
504 _aIncludes Appenidx.
520 _aविज्ञापनों का ख़ासा असर शुरुआती दौर में आहिस्ता-आहिस्ता किन्तु कालान्तर में धूम-धड़ाके के साथ भारतीय समाज में गहरे पसर चुका है। साफ़ शब्दों में, तमाम दर्जनों लांछनाओं के बावजूद आज हम विज्ञापनों के जिस मायावी संसार का सामना कर रहे हैं, उससे बचना हमारे लिए मुश्किल हो गया है। एक ओर अभिव्यक्ति के अधिकांश मंच-मचान और माध्यमों से इसका अटूट रिश्‍ता स्थापित हो चुका है तो दूसरी ओर यह सम्प्रेषण की मुकम्मल, पुख्ता और आकर्षक विधा और माध्यम तो बन ही गया है। अब यह व्यावसायिक शक्ति, विक्रय कला की प्रणाली, लोकसेवा, घोषणा, उपभोक्ता के लिए सूचना और सुझाव, व्यावसायिक ज़रिया और क्रय-शक्ति के संवर्धक के रूप में अपनी सार्थकता सिद्ध कर रहा है। विज्ञापनों के बिना, बिलाशक बाज़ार चल नहीं सकता। बाज़ार को यह सुसम्पन्न और लुभावना बनाता है, उसे सजाता और साधता है। बिना इसके मीडिया के सामने अस्तिव का संकट पैदा हो सकता है। इसने भाषा, संस्कृति के साथ जीवन की कई चीज़ों को बदल दिया है। https://rajkamalprakashan.com/vigyapan-bazar-aur-hindi.html?srsltid=AfmBOoop2unaL3X4zHygILxGiE8gCo0LFE6Ry7vGKi3CNjEnzSfyb4pi
650 _aHindi Advertisements
650 _aMarket Linguistics
650 _aConsumer Language Studies
650 _aHindi in Commerce
650 _aMarket Communication
650 _aMarketing Discourse
942 _cTD
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