Beete kitane baras=बीते कितने बरस
Publication details: Delhi: Vani Prakashan, 2024.Description: 85p.: hbk.; 23 cmISBN:- 9788170552437
- 891.4317 SHU
| Item type | Current library | Collection | Call number | Copy number | Status | Barcode | |
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Hindi Books
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IIT Gandhinagar | General | 891.4317 SHU (Browse shelf(Opens below)) | 1 | Available | 034841 |
प्रयाग शुक्ल हिन्दी के एक ऐसे कवि हैं जिनकी कविताएँ प्रकृति से मनुष्यों और मनुष्यों से प्रकृति तक की यात्रा अपने नैरन्तर्य में बिना किसी निग्रह के जिस तरह करती हैं, वह उनके सृजनलोक को अपनी दृष्टि, संवेदना और भाषा-शैली में विपुल तो बनाता ही है, विशिष्ट भी बनाता है । और इसका उदाहरण है उनका यह कविता-संग्रह बीते कितने बरस ।
प्रयाग जी की विषय-वस्तु गढ़ी हुई नहीं, जी हुई होती है, इसलिए उनकी चिन्ताएँ गहन रात में भी जाग रही होती हैं और अपनी सोच में विचरती रहती हैं जिन्हें 'होटल के कमरे में रात को' कविता में स्पष्ट देखा जा सकता है, जहाँ बाहर की आवाजें अन्दर तक आ रहीं - कौन है जो भगाये ले जा रहा है मोटर साइकिल रात को सड़कों पर सोया है शहर जब... क्या है भगोड़ा वह ...घर पर कोई बीमार है ...कौन है/\... नींद फुटपाथों की तोड़ता/कुत्तों को भँकता/छोड़ता! फिर वह सिहर भी जाते हैं-चीरता हुआ रात को कौन है? हत्यारा? वे जब 'उन्माद के ख़िलाफ़ एक कविता' लिखते हैं तब उन्माद की गहरी पड़ताल करते प्रकृति के ज़रिये इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि बीजों, पेड़ों, पत्तों में नहीं होता उन्माद । वह आँधी में होता है जो ज़्यादा देर तक तो नहीं ठहरती लेकिन बहुत कुछ ध्वंस करके चली जाती है। इसलिए हम जब उन्माद में होते हैं, देख नहीं पाते फूलों के रंग क्योंकि फूलों के रंग देखने के लिए मनुष्य होना ज़रूरी होता है। यह कविता ऊपरी तौर पर राजनीतिक न होते हुए भी साम्प्रदायिकता के बारे में कुछ कह जाती है; और 'वहाँ' कविता में जो दंगे का धुआँ है, उसे भी दूर से ही सही, गहरे समझा जा सकता है। उन्माद के इस परिदृश्य में उनकी 'युद्ध' कविता को भी पढ़ा जा सकता है, जो अपनी कहन में इतनी मार्मिक है कि अन्दर तक हिला देती है-अरे, वहाँ कोई घर/भहराया/वह भी किसी आदमी का था/उसमें भी रहते थे बच्चे।
दुःख पर तो कइयों ने कविताएँ लिखी हैं लेकिन प्रयाग जी अपनी बानी से जो बिम्ब रचते हैं, वह दूर तक कहीं दिखाई नहीं देते। 'एक दृश्य' की ये पंक्तियाँ- एक घड़े के आधे टूटे हुए मुँह के भीतर/भरा है दुःख हों या 'स्त्रियाँ लाती थीं मीलों दूर से भरकर घड़े' की ये पंक्तियाँ - आँधी चलती थी/बूँदें गिरती थीं/रोती थीं कविता/की दुनिया में रात को नदियाँ वेदना के एक अनछुए छोर तक लिये चली जाती हैं। इसलिए वे जब सम्बन्ध-सूत्र रचते हैं, दुःख या त्रासदी को बाँचते भरोसे को रचते हैं जो कहीं से भी सायास नहीं लगता ।
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