Dead end=डेड एन्ड
Publication details: Delhi: Vani Prakashan, 2024.Description: 99p.: hbk.; 22 cmISBN:- 9789355189004
- 891.43371 GUP
| Item type | Current library | Collection | Call number | Copy number | Status | Barcode | |
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Hindi Books
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IIT Gandhinagar | General | 891.43371 GUP (Browse shelf(Opens below)) | 1 | Available | 034857 |
डेड एंड पद्मेश गुप्त की कहानियों का नवीनतम संग्रह है। मूल्यों के टकराव का सजीव चित्रण है पद्मेश गुप्त के लेखन में। 'तिरस्कार', 'डेड एंड', 'कब तक' मिली-जुली संस्कृति के टकराव को बखूबी चिह्नित करती हैं। पद्मश जी रफ़्तार से कहानी आगे बढ़ाते हैं और अन्त तक आकर पाठक को अपने कथा-संसार में शामिल कर लेते हैं।
- ममता कालिया
डॉ. पद्मेश गुप्त शिक्षा और भाषा-सेवा के क्षेत्र में एक जाना-पहचाना नाम है। भारत के बाहर रहकर जिन लोगों ने हिन्दी की सेवा की है, उनमें डॉ. पद्मेश गुप्त का नाम प्रमुख है। डॉ. गुप्त ने कवि और सम्पादक के रूप में प्रतिष्ठा अर्जित की है। डेड एंड उनका पहला कहानी-संग्रह है। डॉ. गुप्त की कहानियाँ उनके चार दशक के प्रवासी जीवन की अनुभूतियों को प्रतिबिम्बित करती हैं। इन कहानियों में प्रवासी जीवन को देखने की एक नयी दृष्टि है जो विषयों और घटनाओं के बहुरंगी वैविध्य का सुन्दर उदाहरण है। समाज, धर्म, राजनीति, संस्कृति से लेकर व्यक्तिगत सम्बन्ध तक अलग विषयों को छूती ये कहानियाँ पिछले वर्षों में अलग-अलग पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं जिन्हें पाठकों ने सराहा है। उन्हें एक संग्रह के रूप में लाकर समग्रता देने का काम वाणी प्रकाशन ने किया है। यह कहानी-संग्रह एक हिन्दी सेवी के रूप में डॉ. पद्मेश गुप्त की वैश्विक पहचान को और समृद्ध करने वाला है। यह भारत के बाहर बसे भारत की मनोव्यथा को जानने-समझने का एक श्रेष्ठ माध्यम है। डॉ. पद्मेश गुप्त का यह कहानी-संग्रह डेड एंड, जो वास्तव में एंड नहीं बल्कि एक शानदार बिगिनिंग है।
- डॉ. सच्चिदानन्द जोशी
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