Bihar main chunav: jaati, hinsa aur buth loot=बिहार में चुनाव: जाति, हिंसा और बूथ लूट
- 2nd ed.
- New Delhi: Vani Prakashan, 2024.
- 178p. hbk.; 23 cm.
Includes Appendix
बिहार में चुनाव : जाति, हिंसा और बूथ लूट - पिछले सौ वर्षों में बिहार का जातीय परिदृश्य बिल्कुल बदल गया है । शिक्षा का प्रसार और विभिन्न जातीय समूहों के बीच आधुनिक मध्यवर्ग का उदय, जातीय और धार्मिक सुधार, स्वतंत्रता और किसान आंदोलन, मध्यवर्ती और दलित जातियाँ का प्रतिनिधित्व करनेवाले विचारों और राजनीतिक दलों का अभ्युदय, ज़मींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार तथा बालिग मताधिकार पर आधारित लोकतंत्र इन सभी कारकों के सम्मिलित प्रभाव से ही ऐसा संभव हुआ।
जातियों का परंपरा से चला आ रहा सामाजिक ढाँचा और जातियों के बीच राजनीतिक समीकरण हमेशा ताल मिलाकर नहीं चलते। मध्यवर्ती और दलित जातियों के सामाजिक आंदोलनों में हमेशा उच्च जातियों के एक हिस्से ने शिरकत की है। ऐसे आंदोलनों के अनेक नेता और सिद्धांतकार प्रायः उच्च जाति के बुद्धिजीवी रहे हैं। इसके अलावा, जातियों की बहुलता किसी भी एक जाति के वर्चस्व को असंभव बना देती है। सामाजिक रूप में दो ध्रुवों पर रहने के बावजूद राजनीतिक समीकरण में ब्राह्मण और दलित लंबे समय तक साथ-साथ रहे। मध्यवर्ती जातियों के उत्थान के दौर में जो पिछड़ा-दलित-मुसलमान समीकरण बना, उसमें भी उच्च जाति के एक महत्वपूर्ण घटक राजपूत शामिल थे। बालिग मताधिकार इस तरह के जातीय समीकरणों को ज़रूरी बना देता है। समाज का जितना ज़्यादा लोकतांत्रिकरण होता जाता है, राजनीति में जातीय समीकरणों की गतिशीलता भी उतनी ही बढ़ती जाती है। नये-नये जातीय समूह धीरे-धीरे लोकतंत्र में अपनी पहचान जताने लगते हैं और सत्ता में हिस्सेदारी के लिए मोलतोल करने लगते हैं। इस तरह लोकतंत्र में जातियों की बहुलता जाति के परंपरागत सामाजिक ढांचे को कमज़ोर करने और उसके टूटने में सहायता प्रदान करती है।