Andhere mein buddha=अँधेरे में बुद्ध
Publication details: Delhi: Rajkamal Prakashan, 2024.Description: 158p.: hbk.; 21 cmISBN:- 9789360864132
- 891.43171 GIL
| Item type | Current library | Collection | Call number | Copy number | Status | Barcode | |
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Hindi Books
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IIT Gandhinagar | General | 891.43171 GIL (Browse shelf(Opens below)) | 1 | Available | 034889 |
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| 891.43171 DIN Urvashi = उर्वशी | 891.43171 FAI Pratinidhi kavitayen: Faiz Ahmed ‘Faiz’ = प्रतिनिधि कवितायेन: फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़' | 891.43171 GIL Thapak thapak dil thapak thapak=थपक थपक दिल थपक थपक | 891.43171 GIL Andhere mein buddha=अँधेरे में बुद्ध | 891.43171 GIL Main jab tak aayi bahar=मैं जब तक आई बाहर | 891.43171 GUP Bharat-bharati = भारत-भारती | 891.43171 GUP Yasodhara = यशोधरा |
उनींद, अवसाद, शोक, स्मृतियाँ, आत्मा के ख़ाली पात्र को भरता एकान्त और उसे वापस सोख लेता अकेलापन, मृत्यु, बिछोह और दुख, ‘अँधेरे में बुद्ध’ की कविताएँ ऐसे ही तत्वों से बनी हैं। ये कविताएँ जितनी अपने बारे में हैं उतनी ही दूसरों के बारे में, और उन चीज़ों के बारे में जो सबकी हैं, जैसे सपने, जैसे हताशाएँ, जैसे पीड़ा।
ये कविताएँ अपने आधे सिर के दर्द के साथ कभी ईश्वर से संवाद करती हैं, कभी अपनी देह से, कभी-कभी उन लोगों से भी जो चले गए, लेकिन जो हमारी देह की किसी टीसती नस में अभी भी जीवित बहते हैं।
ये कविताएँ उन ततैयों के बारे में भी हैं जो जीवन की दीप्ति में प्रकाशमान हमारे माथों के भीतर चुपचाप बैठे रहते हैं, और व्यर्थताबोध की किसी तीखी कौंध में अचानक भन्नाने लगते हैं, और बेशक उनके बारे में भी जो चुप बैठते ही नहीं, रात-दिन भन्नाते ही रहते हैं—हर साँस पर और तेज़।
दुख के खोटे सिक्के को बचाने को व्याकुल इन कविताओं में प्रेम का दुख भी है, आत्मा और देह के दुख भी हैं, इतिहास के दुख भी हैं, जीवन की दैनिंदिनी की मशीन से झरते दुख भी हैं...और वह दुख भी है जो बस इसीलिए होता है, क्योंकि हम होते हैं, जिसे बुद्ध ने देखा।
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