Diksha=दीक्षा
Publication details: Delhi: Vani Prakashan, 2024.Edition: 4th edDescription: 192p.: hbk.; 23 cmISBN:- 9788181431905
- 891.4337 KOH
| Item type | Current library | Collection | Call number | Copy number | Status | Barcode | |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
Hindi Books
|
IIT Gandhinagar | General | 891.4337 KOH (Browse shelf(Opens below)) | 1 | Available | 034867 |
Browsing IIT Gandhinagar shelves,Collection: General Close shelf browser (Hides shelf browser)
|
|
|
|
|
|
|
||
| 891.4337 KAM Samudra mein khoya hua aadmi = समुद्र में खोया हुआ आदमी | 891.4337 KAR Udhar ki zindagi=उधार की जिंदगी | 891.4337 KHE Marwadi rajbadi=मारवाड़ी राजबाड़ी | 891.4337 KOH Diksha=दीक्षा | 891.4337 MEH Jalsaghar = जलसाघर | 891.4337 MEH Doobte mastool = डूबते मस्तूल | 891.4337 MEH Do ekant = दो एकान्त |
दीक्षा, अवसर, संघर्ष की ओर तथा युद्ध के अनेक सजिल्द, अजिल्द तथा पॉकेटबुक संस्करण प्रकाशित होकर अपनी महत्ता एवं लोकप्रियता प्रमाणित कर चुके हैं। महत्त्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में इसका धारावाहिक प्रकाशन हुआ है। ओड़िया, कन्नड़, मलयालम, नेपाली, मराठी तथा अंग्रेज़ी में इसके विभिन्न खण्डों के अनुवाद प्रकाशित होकर प्रशंसा पा चुके हैं। इसके विभिन्न प्रसंगों के नाट्य-रूपान्तर मंच पर अपनी क्षमता प्रदर्शित कर चुके हैं तथा परम्परागत रामलीला मण्डलियाँ इसकी ओर आकृष्ट हो रही हैं। यह प्राचीनता तथा नवीनता का अद्भुत संगम है।
इसे पढ़कर आप अनुभव करेंगे कि आप पहली बार एक ऐसी रामकथा पढ़ रहे हैं जो सामयिक, लौकिक, तर्कसंगत तथा प्रासंगिक है। यह किसी अपरिचित और अद्भुत देश तथा काल की कथा नहीं है। यह इसी लोक और काल की, आपके जीवन से सम्बन्धित समस्याओं पर केन्द्रित एक ऐसी कथा है, जो सार्वकालिक और शाश्वत है और प्रत्येक युग के व्यक्ति का इसके साथ पूर्ण तादात्म्य होता है।
https://vaniprakashan.com/home/product_view/4687/Diksha
There are no comments on this title.