Kal mrig ki peeth par=काल मृग की पीठ पर
Publication details: Delhi: Vani Prakashan, 2024.Description: 127p.: hbk.; 23 cmISBN:- 9789357759755
- 891.4317 SHR
| Item type | Current library | Collection | Call number | Copy number | Status | Barcode | |
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Hindi Books
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IIT Gandhinagar | General | 891.4317 SHR (Browse shelf(Opens below)) | 1 | Available | 034799 |
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| 891.4317 PAN Sumitranandan Pant granthavali: Vols. 1-7 = सुमित्रानंदन पंत ग्रन्थावली: खंड 1-7 | 891.4317 PAN Sumitranandan Pant granthavali: Vols. 1-7 = सुमित्रानंदन पंत ग्रन्थावली: खंड 1-7 | 891.4317 SAX Dhoop ki lapet=धूप की लपेट | 891.4317 SHR Kal mrig ki peeth par=काल मृग की पीठ पर | 891.4317 SHR Surajmukhi ke kheton tak=सूरजमुखी के खेतों तक | 891.4317 SHU Beete kitane baras=बीते कितने बरस | 891.4317 SIN Karwat=करवट |
काल मृग की पीठ पर प्रख्यात कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव का नया संग्रह है। यहाँ तक पहुँचते-पहुँचते कवि ने एक लम्बी काव्य-यात्रा पूरी की है। इस संग्रह के शीर्षक के बहाने हिन्दी कविता और समाज को एक नया दृश्य-बिम्ब मिला है। जितेन्द्र की कविताओं में विन्यस्त सहजता काल और समय के साथ कवि के यथार्थ रिश्तों के कारण सम्भव हुई है। यह कवि मनुष्य जीवन की ऐहिकता को पूरे सम्मान के साथ समझने की कोशिश करता है। वह कविता को किसी सिद्धान्त की प्रयोगशाला नहीं बनाता क्योंकि वह जानता है कि कविता जीवन की गहरी सामाजिकता से निःसृत होती है। यही कारण है कि जितेन्द्र की कविताएँ सीधे विवेक की आत्मा और आत्मा के विवेक को संवेदित करती हैं।
जितेन्द्र की कविताओं में यह देखना सुखद है कि कविताओं में उनका प्रयास दिखने में जितना सरल है, अपनी अभिव्यक्ति की बारीकियों में उतना ही सघन, तलस्पर्शी और राजनीतिक भी है। उनकी कविताएँ भारतीय जन-समाज की सगुणात्मक सच्चाइयों का विश्वसनीय रूपक हैं। ये कविताएँ हमारी संवेदना को चाक्षुष भी बनाती हैं। यह भी एक महत्त्वपूर्ण तथ्य है कि ये कविताएँ कथ्य को महज़ एक भाषिक प्रतीति में बदल डालने की कोशिशों का सचेत प्रत्याख्यान हैं।
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