Marwadi rajbadi=मारवाड़ी राजबाड़ी
Publication details: Delhi: Vani Prakashan, 2024.Description: 92p.: hbk.: 22 cmISBN:- 9788119014538
- 891.4337 KHE
| Item type | Current library | Collection | Call number | Copy number | Status | Barcode | |
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Hindi Books
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IIT Gandhinagar | General | 891.4337 KHE (Browse shelf(Opens below)) | 1 | Available | 034776 |
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| 891.4337 GOR Ashiyana=आशियाना | 891.4337 KAM Samudra mein khoya hua aadmi = समुद्र में खोया हुआ आदमी | 891.4337 KAR Udhar ki zindagi=उधार की जिंदगी | 891.4337 KHE Marwadi rajbadi=मारवाड़ी राजबाड़ी | 891.4337 KOH Diksha=दीक्षा | 891.4337 MEH Jalsaghar = जलसाघर | 891.4337 MEH Doobte mastool = डूबते मस्तूल |
मारवाड़ी राजबाड़ी की उस छोरी ने अपनी बातों में हरियाणवी मिश्रित मारवाड़ी भाषा की लचक और लहजे का जो 'छौंक' लगाया था उसे सुनते ही वह साढ़े छह फीटिया साफ़ाधारी इतना ख़ुश हुआ कि उसने हुमक कर उस गुलाबी-परी को अपनी गोद में उठाकर कहा, “हे मेरी लाडो ! जलसे का मतलब होवे है, कई तरियाँ के नाच गाणे, जिसमें ज़मींदार साहब के ख़ास मेहमान आवेंगे।” “नाच भी होवेगा ठाकरा जी।" “हाँ, बेबी साहिबा, वो तो होणा ही है।” यह सुनते ही वह महारानी ठाकरा जी की गोद से ऐसी तेज़ी से फिसली जैसे बच्चे फिसलने से फिसलते हैं। उसकी इस हरकत से बेचारे ठाकरा जी तो ऊक-चूक हो गये और ओय! ओय! करते हुए उसे सँभालने के लिए तेज़ी से आगे बढ़े ही थे कि बहादुर ने उनकी पीठ को दिलासा में थपथपाकर कहा, “साबजी उसको कुछ नहीं होगा। आप उसको जानता नहीं है, ऊपर आकाश में जब भगवान बदमाशी बाँटता था, तब इसने उसे अपना सिर में सबसे जादा भर लिया था।"
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