Tulsidas chandan ghisain = तुलसीदास चन्दन घिसैं
Publication details: Rajkamal Paperbacks, 2021. New Delhi:Description: 159p.; pbk; 22cmISBN:- 9788126710560
- 891.43871 PAR
| Item type | Current library | Collection | Call number | Copy number | Status | Barcode | |
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Hindi Books
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IIT Gandhinagar | General | 891.43871 PAR (Browse shelf(Opens below)) | 1 | Available | 032187 |
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| 891.43871 PAR Vaishnav ki phislan = वैष्णव की फिसलन | 891.43871 PAR Vikalang shraddha ka daur = विकलांग श्रद्धा का दौर | 891.43871 PAR Awara bheed ke khatare = आवारा भीड़ के खतरे | 891.43871 PAR Tulsidas chandan ghisain = तुलसीदास चन्दन घिसैं | 891.43871 PAR Thithurata huaa gantantra = ठिठुरता हुआ गणतंत्र | 891.43871 PAR Kahat kabeer = क़हत कबीर | 891.43871 PAR Kaag bagodha = काग भगोड़ा |
Includes authors introduction
हरिशंकर परसाई के लिए व्यंग्य साध्य नहीं, साधन था। यही बात उनको साधारण व्यंग्यकारों से अलग करती है। पाठक को हँसाना, उसका मनोरंजन करना उनका मक़सद नहीं था। उनका मक़सद उसे बदलना था। और यह काम समाज-सत्य पर प्रामाणिक पकड़, सच्ची सहानुभूति और स्पष्ट विश्व-दृष्टि के बिना सम्भव नहीं हो सकता। ख़ास तौर पर अगर आपका माध्यम व्यंग्य जैसी विधा हो। हरिशंकर परसाई के यहाँ ये सब ख़ूबियाँ मिलती हैं। उनकी दृष्टि की तीक्ष्णता और वैचारिक स्पष्टता उनको व्यंग्य-साहित्य का नहीं विचार-साहित्य का पुरोधा बनाती है।
तुलसीदास चन्दन घिसैं के आलेखों का केन्द्रीय स्वर मुख्यत: सत्ता और संस्कृति के सम्बन्ध हैं। इसमें हिन्दी साहित्य का समाज और सत्ता प्रतिष्ठानों से उसके सम्बन्धों के समीकरण बार-बार सामने आते हैं। पाक्षिक ‘सारिका’ में 84-85 के दौरान लिखे गए इन निबन्धों में परसाई जी ने उस दुर्लभ लेखकीय साहस का परिचय दिया है, जो न अपने समकालीनों को नाराज़ करने से हिचकता है और न अपने पूर्वजों से ठिठोली करने से जिसे कोई चीमड़ नैतिकता रोकती है।
गौरतलब यह कि इन आलेखों को पढ़ते हुए हमें बिलकुल यह नहीं लगता कि इन्हें आज से कोई तीन दशक पहले लिखा गया था। हम आज भी वैसे ही हैं और आज भी हमें एक परसाई की ज़रूरत है जो चुटकियों से ही सही पर हमारी खाल को मोटा होने से रोकता रहे।
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