Dhruvaswamini = ध्रुवस्वामिनी
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TextPublication details: Ahmedabad: Dhrumil Prakashana, 2005.Description: 64p.: ill.; 18cmSubject(s): DDC classification: - 891.432 PRA
| Item type | Current library | Collection | Call number | Status | Barcode | |
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Hindi Books
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IIT Gandhinagar | General | 891.432 PRA (Browse shelf(Opens below)) | Available | 019508 |
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| 934.04 PRA Chandragupta = चंद्रगुप्त | 891.4334 KHA Chandrakanta = चन्द्रकान्ता | 891.4335 KHA Chandrakanta Santati, vol. 1 = चन्द्रकान्ता सन्तति खंड-1 | 891.432 PRA Dhruvaswamini = ध्रुवस्वामिनी | 891.431 BAC Do chattanein = दो चट्टानें | 891.4335 PRE Durgadass = दुर्गादास | 891.4335 PRE Gabana = गबन |
गुप्त काल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में रचा गया नाटक ‘ध्रुवस्वामिनी’ जयशंकर प्रसाद की अन्तिम नाट्य-कृति है जिसे उनकी श्रेष्ठतम नाट्य-रचना भी माना जाता है। मंचन की दृष्टि से भी अत्यन्त सफल रहे इस नाटक की घटनाओं का इतिहास-सम्मत तथ्यों की रोशनी में विवेचन भी प्रसाद ने इस पुस्तक में किया है।
नाटक की कथा गुप्तवंश के शासक रामगुप्त की पत्नी ध्रुवस्वामिनी के इर्द-गिर्द घूमती है और प्राचीन भारत में स्त्री के आत्मसम्मान तथा साहस को रेखांकित करती है। रामगुप्त की उपेक्षा और सन्देह की शिकार ध्रुवस्वामिनी कायर राजा के निर्णय का सशक्त प्रतिरोध कर अपने सम्मान की रक्षा करती है तथा चन्द्रगुप्त के साथ मिलकर राज्य के शत्रु शकराज से भी मुक्ति पाती है।
यह नाटक भारतीय स्त्री का एक अनूठा चित्र प्रस्तुत करता है जिसमें नारीसुलभ कोमल भावनाओं के साथ-साथ राष्ट्रप्रेम तथा अपने निजी सम्मान का अद् भुत सम्मेल देखने को मिलता है।
नाटक की भाषा संस्कृतनिष्ठ होते हुए भी इतनी प्रवहमान है कि हर पात्र तथा हर परिस्थिति का जैसे एक चित्र हमारे सामने उभरता चलता है। बहुत ज़्यादा पात्र का न होना इसे मंच-संयोजन के लिहाज़ से भी एक अच्छे नाटक का रूप देता है।
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