Inquilab zindabad=इंकलाब जिंदाबाद

Narang, Gopi Chand

Inquilab zindabad=इंकलाब जिंदाबाद - Delhi: Vani Prakashan, 2024. - 316p.: hbk.; 22 cm.

यह वास्तविकता है कि उर्दू शायरी सामाजिक सरोकार से कटकर छुईमुई की तरह किसी काँच के घर में परवान नहीं चढ़ी। इसमें शुरू से सामाजिक, पारम्परिक और राष्ट्रीय संवेदना पायी जाती है (यद्यपि राष्ट्र की व्याख्याएँ बदलती रहती हैं)। उर्दू ने अपने लिए कभी भी युग और वातावरण से हटकर अलग रास्ता नहीं खोजा । देखा जाये तो उर्दू भाषा दो परम्पराओं, दो संस्कृतियों और दो भाषाओं का संगम है। यही कारण है कि इसमें दो सभ्यताओं की मिलीजुली गंगा-जमुनी बहार हमें धनक के रंगों की तरह दिखाई देती है। जैसा कि हम जानते हैं कि यह संगम भारत की धरती पर हुआ, इसलिए उर्दू भाषा का बुनियादी ढाँचा तो भारतीय ही है पर कहीं-कहीं इसमें विदेशी स्थान, सभ्यता और संस्कृति के जो लक्षण दिखाई देते हैं, इन्हें हम एक औपचारिकता मात्र ही मान सकते हैं।

यह बात भी ध्यान रखने योग्य है कि मध्यकालीन भारत में देशभक्ति का अभिप्राय आज के युग की परिभाषा से अलग था। उस समयकाल में सांस्कृतिक एकता का भाव समाज में नहीं था। कारण था इतिहास और सभ्यता से जुड़ी विशेष परिस्थितियाँ। देशभक्ति की सामूहिक सोच बहुत बाद की बात है। उस समय की देशभक्ति हमारी दूसरी सामाजिक और सांस्कृतिक सोच की तरह निजी और व्यक्तिगत थी। इसकी बुनियाद सामूहिक एकता पर न होकर निजी और स्थानीय आधारों पर केन्द्रित होकर रह गयी थी, और इसकी अभिव्यक्ति भी स्थानीय और सीमित दायरों में कैद थी। उर्दू के उत्थान के इस आरम्भिक युग में प्राचीन और आधुनिक अवधारणाओं के बीच के फर्क को हमें ध्यान रखते हुए आगे बढ़ना होगा।

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